भारत सरकार ने जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन के लिए अनुच्छेद 370 को त्याग दिया है। इस पर चर्चा करते हैं।

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आज सुबह राज्य सभा में, भारत के गृह मंत्री, अमित शाह ने एक विधेयक पेश किया, जिससे अंग्रेजों के जाने के बाद जम्मू और कश्मीर को भारत के साथ शामिल होने पर को जो विशेष दर्जा दिया गया था उसे वापस ले लिया गया है। सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A को खारिज कर दिया है और जम्मू और कश्मीर राज्य (J & K) को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया है: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख। जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक दलों के नेताओं को घर में नजरबंद कर के रखा गया है, अतिरिक्त सैनिकों को क्षेत्र में स्थानांतरित किया जा रहा है, फोन और इंटरनेट इस्तमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और लोगों से सार्वजनिक रूप से इकट्ठा न होने के लिए कहा गया है। 

 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के बीच क्या अंतर है?  केंद्र शासित प्रदेश को केंद्र नियंत्रित करता है। राज्य में एक राज्य सरकार होती है।

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक कहता है कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में चंडीगढ़ की तरह कोई विधानसभा नहीं होगी। अन्य केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में दिल्ली और पुदुचेरी की तरह एक विधायिका होगी।

अनुछेद 370 क्या है? भारत के विभाजन के दौरान, जम्मू और कश्मीर से, अन्य मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की तरह, पाकिस्तान का हिस्सा बनने की उम्मीद थी।

जम्मू और कश्मीर की रियासत के नेता, महाराजा हरि सिंह स्वतंत्रता चाहते थे इसलिए उन्होंने एक विशेष समझौते पर हस्ताक्षर किए और भारत के साथ एक रिश्ता बनाया। भारत ने बदले में पाकिस्तान से आक्रमण के खिलाफ शासक की मदद करने का वादा किया।

1949 में, भारत के संविधान में अनुछेद 370 नामक एक विशेष प्रावधान जोड़ा गया जिसमें जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया। अनुच्छेद 370 राज्य को अपना संविधान, एक अलग झंडा और विदेशी मामलों, रक्षा और संचार को छोड़कर सभी मामलों में स्वतंत्रता की अनुमति देता है। यह जम्मू और कश्मीर के लोगों को शेष भारत से अलग-अलग अधिकार देता है, जहां सभी के लिए समान कानून लागू होते हैं।

अनुच्छेद 35A क्या है?  यह जम्मू और कश्मीर के निवासियों की रक्षा करता है और उन्हें विशेष अधिकार देता है। यह निवासियों को उन लोगों के रूप में परिभाषित करता है जो 1954 में इस क्षेत्र में रहते थे, या जो लगातार कम से कम 10 वर्षों से वहां रह रहे थे। केवल निवासी ही सरकारी नौकरी पा सकते हैं और जम्मू-कश्मीर में शिक्षा छात्रवृत्ति पा कर सकते हैं, और केवल निवासी ही जमीन खरीद और रख सकते हैं।

इसमें इतनी बड़ी बात क्या है कि जम्मू और कश्मीर को पुनर्गठित किया गया है और इन अनुछेदों को हटा दिया गया है?  अनुछेद 370 और जम्मू और कश्मीर का दर्जा बहुत लंबे अरसे तक चर्चा में रहे हैं।जम्मू और कश्मीर  के लोग इसलिए परेशान हैं क्योंकि यह समझौता ही वह शर्त थी जिसके तहत विभाजन के समय जम्मू और कश्मीर  क्षेत्र पाकिस्तान की बजाय भारत के साथ पक्षधर थे। दूसरे लोग जिस तरह से यह अचानक और संसद में बिना चर्चा कर के किया गया उसे लेकर परेशान हैं। भारत एक लोकतंत्र है, और वे तर्क देते हैं कि ऐसा करने का सही तरीका इस मुद्दे पर पूरी तरह से बहस करना और जम्मू-कश्मीर के नेताओं को इस पर प्रतिक्रिया देना होता। नेताओं को पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया था। इस तरह, सत्तारूढ़ दल ने लोकतंत्र की प्रक्रिया का पालन किए बिना वो निर्णय लिया है जो उन्हें देश के हित में लगा।

वे ऐसा कैसे कर सकते थे? अनुच्छेद 370 में एक प्रावधान है जो कहता है कि है अगर राज्य विधायिका सहमत हो तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 को भंग कर सकता है। जम्मू और कश्मीर 2019 में राष्ट्रपति शासन के अधीन रहे हैं, और उनके चुनाव अभी भी होने हैं। राष्ट्रपति के पास इस पर चर्चा करने और अनुमोदन लेने के लिए कोई विधायिका नहीं था, इसलिए राष्ट्रपति यह निर्णय लेने और ऐसा कर पाने में सक्षम थे। तकनीकी रूप से सरकार ने इसे इस तरह पूरा किया। बहुत चालाकी है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार ने इस पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 को हटाने का प्रस्ताव क्यों दिया ?

उनका मानना ​​है कि अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों के साथ जुड़ने की अनुमति नहीं दी है। जम्मू-कश्मीर राज्य में ज़्यादा आर्थिक विकास नहीं हुआ है और कई सुरक्षा उल्लंघनों और आतंकवादी घटनाओं को देखा गया है, आखिरी पुलवामा का हमला था। राज्य के लिए विशेष नियमों का मतलब है कि राज्य के बाहर के लोग वहाँ निवेश नहीं कर सकते थे और ज़मीन नहीं खरीद सकते थे जिससे व्यवसायों को बढ़ने का मौका नहीं मिल पा रहा था। इसके अलावा आरक्षण की कमी के कारण अल्पसंख्यक समूहों जैसे अनुसूचित जातियों और महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा रहा था।

विभाजन के दौरान अस्थायी प्रावधान के रूप में, भारत के पहले प्रधान मंत्री, जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक रूप से अनुच्छेद 370 की शुरुआत की थी। जम्मू-कश्मीर का यह विशेष दर्जा और शेष भारत के साथ इसका संबंध कई वर्षों से बहस का मुद्दा रहा है।

आज के राजनीतिक कदम से लाखों कश्मीरियों का जीवन बदल जाएगा। क्या यह राजनीतिक कदम जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का जवाब होगा? या यह भारत में आधुनिक-राष्ट्रवाद का उदाहरण है? और जानने के लिए यह जगह देखें।


लेखक: बियाश चोकसी और सुनैना मूर्ति

स्रोत: स्क्रॉल.इन, बीबीसी.कॉम, बिजनेस स्टैंडर्ड, द इकोनॉमिक टाइम्स, इंडिया टुडे, दप्रिंट.इन

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