हाँग काँग में क्या चल रहा है?

एडिटोरियल क्रेडिट: / शटरस्टॉक.कॉम कॉव्लून, हॉंग कॉंगमें – 17 नवंबर, 2019: एक प्रदर्शन के दौरान पॉलिटेक्निक विश्वविद्यालय में एक ऊपरी वॉकवे के दृश्य को अवरुद्ध करने के लिए छतरियों का उपयोग किया गया

जून 2019 से हॉंग कॉंग में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। यह तब शुरू हुआ जब सरकार ने हॉंग कॉंग के अपराधियों  को मुख्य भूमि चीन  (मेन लैंड चाइना) भेजने या प्रत्यर्पित करने का अत्यधिक विवादास्पद नियम लाने की कोशिश की। हालांकि सरकार ने फैसला वापस ले लिया, पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प पांच महीने बाद भी जारी है, और वे हिंसक हो गए हैं।

हॉंग कॉंग के लोग अब पुलिस की बर्बरता और हॉंग कॉंग को बीजिंग द्वारा जिस तरह नियंत्रित किया जा रहा है उसका विरोध कर रहे हैं । विरोध बड़े स्तर पर सार्वजनिक समर्थन के साथ बढ़ रहा है।

स्कूल और शिक्षा परिसरों को हिंसा से मुक्त रखा गया है, लेकिन पिछले सप्ताह 2 बड़े परिसरों में हिंसक प्रदर्शनों की लहर देखी गई।

कई हाई स्कूल के छात्रों सहित सैकड़ों प्रदर्शनकारी, हॉंग कॉंग में पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी (पॉलीयू) परिसर के अंदर जमा हुए। रविवार को हुआ यह प्रदर्शन पिछले 5 महीनों के कुछ सबसे गंभीर विरोध प्रदर्शनों में से एक था। सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने धनुष और तीर सहित देसी हथियारों का उपयोग करके परिसर में घुसने की कोशिश कर रहे पुलिसवालों से झड़प की।

 

जवाबी कार्यवाही में, पुलिस ने विश्वविद्यालय को घेर लिया और सभी को अपने हथियारों को छोडने, अपने गैस मास्क को हटाने और वहाँ से जाने का आदेश दिया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने बचने की उम्मीद की, और अन्य समर्थकों से मदद मांग रहे थे क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें दंगा करने के लिए गिरफ्तार किया जाएगा।

 

प्रदर्शनकारी कब रुकेंगे? अर्ध-स्वतंत्र चीनी क्षेत्र में विरोध के पीछे के इतिहास के बारे में अधिक पढ़ने के लिए, यहाँ क्लिक करें


अमेरिका का इरादा है औपचारिक रूप से जलवायु परिवर्तन से जुड़े पेरिस समझौते से पीछे हटने का

क्रेडिट: पीस पैलेस लाइब्रेरी
जलवायु परिवर्तन से जुड़े पेरिस समझौते पर 2016 में सहमति व्यक्त की गई थी और 2016 में 197 देशों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। इसका उद्देश्य 21 वीं शताब्दी के अंत तक वैश्विक तापमान की वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे, आदर्श रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बनाए रखना है। यह उद्देश्य तभी पूरा हो पाएगा जब हस्ताक्षर  करने वाले सभी 197 देश अपनी आदतों में व्यापक बदलाव और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रयास करेंगे । समाचार: जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सत्ता में आए, तो उन्होंने इस समझौते में अमेरिका की भागीदारी का विरोध किया। इस हफ्ते, उन्होंने औपचारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका के इस ऐतिहासिक समझौते से हटने के इरादे के बारे में कहा है।
वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनका मानना ​​है कि अगर उनके देश को ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों, जैसे कोयला और जीवाश्म ईंधन से दूर रहने के लिए मजबूर किया जाता है तो अमेरिकी कंपनियों पर बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
इससे क्या फ़र्क पड़ता है? यह चिंताजनक है क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषकों में से एक है।
अब क्या  होगा? अमेरिकी सरकार एक साल के भीतर समझौते से पीछे हट जाएगी, यदि 2020 में एक नया अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं चुना जाता है, जो इस फैसले को पलट सकता है। इस चुनाव पर बहुत कुछ निर्भर  है!
इसके अलावा, कई अमेरिकी व्यवसाई, पर्यावरणविद और अन्य नेता अभी भी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और ऐसा करने के लिए वे अपने तरीकों को बदलने और जागरूकता बढ़ाने और अधिक कंपनियों और व्यवसायों को इसके लिए तैयार करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।
अन्य देश जो इस समझौते का हिस्सा हैं, इस बीच, वैकल्पिक योजना बना रहे हैं जिन्हें अमेरिका की भागीदारी की ज़रूरत नहीं है। इसका मतलब यह है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले बाकी देश ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए अधिक बोझ महसूस करेंगे।
आगे क्या होता है यह देखने के लिए हमारे साथ बने रहिए।


लेखक: सुनैना मूर्ती


रेड एलर्ट! दिल्ली भयानक वायु प्रदूषण का सामना कर रही है

क्रेडिट: इंडिया टुगेथर

खतरनाक वायु प्रदूषण की चेतावनी! सोमवार 4 नवंबर को, भारत की राजधानी नई दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई- वायु गुणवत्ता सूचकांक) 604 पर पहुंच गया!

 

इसका क्या मतलब है? वायु गुणवत्ता सूचकांक(एक्यूआई) वायु प्रदूषण का एक माप है। चार्ट 500 तक जाता है। ये जितना नीचे हो मतलब हवाउतनी ही साफ़ है। 100 से अधिक जितना भी हो, मतलब लोगों के लिए खतरनाक हो सकता है।

सरकारी एजेंसियां ​​यह बताने के लिए एक्यूआई का उपयोग करती हैं कि वर्तमान में वायु कितनी प्रदूषित है।

जैसे ही एक्यूआई बढ़ता है, अधिक लोगों के स्वास्थ्य पर प्रभाव होने की संभावना होती है।

नई दिल्ली में इतनी खराब हवा क्यों है?

शहर और आस-पास के इलाकों को घने जहरीले स्मॉग ने घेर लिया है। यह स्मॉग जहरीले कणों और धूल की एक परत है, जिससे कई स्थानों पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। ये कण विशेष रूप से चिंताजनक हैं क्योंकि ये फेफड़े और रक्त टिसू में प्रवेश करने में सक्षम होते हैं और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनते हैं। लोग पड़ोसी राज्यों में फसलों को जलाना, औद्योगिक और वाहन से हो रही जहरीली गैस के उत्सर्जन को इसके लिए दोषी मानते हैं।

इस शहर के 25 मिलियन लोगों को अक्सर सांस लेने वाली प्रदूषित हवा से निपटना पड़ता है। लेकिन जैसे-जैसे सर्दी का मौसम आता है, वैसे-वैसे समस्या और भी बदतर होती जाती है। गर्म हवा ऊपर उठ जाती है, और ठंडी हवा घनी होती है और नीचे उतरती है। दिल्ली में सर्दियों के दौरान धीमी हवाएं और ठंडा तापमान प्रदूषित हवा को ऊपर नहीं जाने देते हैं और इस क्षेत्र को छोड़ने

नहीं देते हैं। इसी की वजह से वास्तव में हवा में घुलने वाले प्रदूषक ज़मीन के करीब आ गए हैं और शहर को एक जहरीले कंबल की तरह ढंक रखा है।

ज़रा रुकिए: क्या हमने यह पहले भी सुना है? हाँ, हमने पिछले साल भी इस समय इसके बारे में  लिखा था। अरविंद केजरीवाल यहाँ के मुख्यमंत्री हैं। वे कहते हैं कि वे इस समस्या का हल खोजने के लिए दृढ़ हैं, और पड़ोसी राज्यों के नेताओं के साथ मिलकर इस विषैले मुद्दे का समाधान खोजेंगे। उनकी एक पहल उनकी विषम-सम (ऑड-ईवन) योजना को बहाल करना है, जिसके तहत जिनकी कार के लाइसेंस प्लेट पर अंतिम संख्या विषम है वे महीने के विषम संख्या वाले दिनों में ही अपनी कारों का उपयोग करेंगे, और सम संख्या वाले लोग इस दिन अपनी कारें सड़क पर ना उतारें । वे कार पूलिंग को प्रोत्साहित करके कम हानिकारक गैसों का उत्सर्जन करने के लिए सड़क पर कारों की संख्या कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

अन्य नियमों के अंतर्गत लोगों को कचरा जलाने से रोकना है, और निर्माण गतिविधियों को सीमित करना है।

हमें उम्मीद है कि सर्दियों के आने तक नई दिल्ली में स्थिति बेहतर हो जाए, और यह कि नेता एकसाथ आकर कुछ स्थायी समाधान ले आएं।


एक्यूआई क्ष्रेणी    इससे स्वास्थ पर होने वाले प्रभाव

अच्छी (0-50)- न्यूनतम प्रभाव

संतोषजनक (51-100) – संवेदनशील लोगों के लिए थोड़ी सांस की तकलीफ़

मध्यम स्तर पर दूषित (101-200) अस्थमा जैसी फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मरीज को सांस लेने में परेशानी और हृदय रोग के मरीज़ों को भी परेशानी हो सकती है

खराब (201-300)- ज़्यादा लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने वाले लोगों और हृदय रोग के मरीज़ों को सांस लेने में परेशानी हो सकती है

बहुत खराब (301-400)- ज़्यादा लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने वाले लोगों के लिए सांस की समस्या हो सकती है । फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मरीज और हृदय रोग के मरीज़ों को ज़्यादा खतरा।

गंभीर (401-500)- स्वस्थ लोगों को सांस की तकलीफ़ और फेफड़ों/ हृदय रोग के मरीज़ों  को गंभीर स्वास्थ  समस्याएं हो सकती है।  ये स्वास्थ समस्याएं हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधियों के दौरान भी अनुभव हो सकती है।

 


लेबनॉन में विरोध क्यों हैं?

लेबनॉन मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) का एक देश है। पर ये खबरों में क्यों है? ज़िंदगी जीने के लिए बेहतर सुविधाएं और वर्तमान राजनीतिक नीतियों में बदलाव की मांग को लेकर लेबनॉन के नागरिक सड़कों पर उतार आए हैं।

 

विरोध तब शुरू हुआ जब सरकार ने सभी व्हाट्सएप वॉइस कॉल पर 0.20 डॉलर टैक्स जोड़ने की योजना लागू करने का फैसला किया। हालांकि सरकार ने योजना को कुछ ही घंटों के अंदर खारिज कर दिया, लेकिन प्रदर्शन जारी है।

 

वे विरोध क्यों  कर रहे हैं? लेबनॉन के नागरिक हर रोज़ बिजली कटौती, कचरों से भरी सड़कों, पानी की कम आपूर्ति और उच्च कर दरों से परेशान हो चुके हैं।

एक मिलियन से अधिक सीरियाई शरणार्थियों के यहाँ आने से पहले से ही कमज़ोर सार्वजनिक सेवाएं और बदतर हो गई हैं। नागरिक व्यापक भ्रष्टाचार से थक चुके हैं जिसका कारण यहाँ की सरकार और उनका वित्तीय कुप्रबंधन है।

https:/न्यूज़.स्काय. कॉम/स्टोरी/सरकार के भष्टाचार के खिलाफ़ पूरा देश एकजुट -11841691

लेबनॉन में वर्तमान आर्थिक स्थिति कैसी है? यह दुनिया में सबसे अधिक सार्वजनिक ऋण लेने वालों में से एक देश है। इसका मतलब है कि इसने देश के बाहर के व्यवसायों और यहां तक ​​कि अन्य सरकारों से भी पैसा उधार लिया है। ऋण 86 बिलियन डॉलर पर आंका गया है, जो कि देश के राजस्व (जीडीपी – सकल घरेलू उत्पाद जो कि एक वर्ष के दौरान देश में प्रदान उत्पन्न किए गए माल और प्रदा सेवाओं का कुल मूल्य है) से कई गुना अधिक है। देश कर्ज चुकाने में असमर्थ है। सरकार ने इस घाटे की भरपाई के लिए जो काम किए हैं, उनमें से एक है उच्च टैक्स वसूलना। यह नागरिकों को पसंद नहीं आया।

 

सरकार ने इस विरोध के जवाब में क्या किया?

इस विरोध के जवाब में, प्रधानमंत्री साद हरीरी और उनकी सरकार ने बेहतर सुविधा देने के लिए राजनेताओं के वेतन में आधी कटौती करने और गरीब परिवारों को वित्तीय सहायता देने जैसे कदम उठाए हैं।


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ब्रेक्ज़िट में अभी क्या चल रहा है?

समाचार: पिछले सप्ताह यह बताया गया था कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और यूरोपीय संघ के नेताओं ने ब्रेक्ज़िट सौदे के लिए सहमति व्यक्त की थी। वाह! क्या इसका मतलब यह है कि सौदा हो गया? नहीं, उत्तरी आयरलैंड के राजनेता (याद रखें उत्तरी आयरलैंड यूके का हिस्सा है)और ब्रिटिश संसद को अभी इन शर्तों के लिए सहमत होना ज़रूरी है।

 

अभी क्या स्थिति है? शनिवार को ब्रिटिश सांसदों ने बोरिस जॉनसन को कहा कि उन्हें यह सौदा नापसंद है और उनसे कहा है कि वे वापस जाएं और यूरोपीय संघ से ब्रेक्ज़िट की 31अक्टूबर तक की समयसीमा को और बढ़ाने के लिए कहें। उन्होंने यूरोपीय संघ को यह कहते हुए पत्र भेजा कि यह उनकी इच्छाओं के खिलाफ है! लेकिन वे कहते हैं कि उन्हें अभी भी विश्वास है कि वे ब्रिटेन को 31अक्टूबर की समयसीमा तक सौदा पूरा करने के लिए मना लेंगे। अड़चन क्या है? एक प्रमुख मुद्दा है आयरलैंड (ईयू का हिस्सा) और उत्तरी आयरलैंड (यूके का हिस्सा)के बीच सीमा पर स्थित जांच चौकियों की जगह।

 

 

एक बार जब यूके, यूरोपीय संघ से अलग हो जायेगा तो यह सीमा यूके और यूरोपीय संघ के बीच भौतिक संपर्क का एक बिंदु होगा और इस सीमा के पार जाने वाले सामान पर सीमा शुल्क लागू होगा। इस सीमा पार लोगों के आने-जाने पर  भी काफी हद तक नियंत्रण किया जाएगा। यह आयरिश के लिए उनके इतिहास को देखते हुए एक कठिन मुद्दा है, जहां कुछ आयरिश लोग ऐतिहासिक रूप से आयरलैंड गणराज्य का हिस्सा बनना चाहते थे और कुछ यूके का हिस्सा बनना चाहते थे। इसके चलते लगभग 30 साल खून बहाया गया जब तक कि युद्धविराम और समझौते के लिए सहमती नहीं बन गई। ब्रेक्ज़िट के लिए यूके और यूरोपीय संघ के बीच जो सीमा ज़रूरी है वह इस समझौते के लिए खतरा है।  आगे क्या होगा? इस समझौते पर उत्तरी आयरलैंड और ब्रिटिश संसद की सहमति ज़रूरी है।


लेखक : सुनैना मूर्ती


इथोपिया के प्रधान मंत्री ने अपने देश और इरित्रिया के बीच शांति बनाए रखने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार जीता।

नोबेल शांति पुरस्कार सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों में से एक है। यह हमेशा एक बड़ी चर्चा का विषय होता है कि इसके लिए किन्हें नामांकित किया जाएगा। आधिकारिक तौर पर, किसी भी नाम की घोषणा नहीं की जाती क्योंकि नामांकन गुप्त होते हैं (इसका पता केवल पुरस्कार मिलने के 50 साल बाद ही चलता है) लेकिन इसमें हमेशा किसी न किसी का पलड़ा भारी होता है। इस साल पुरस्कार जीतने के लिए जिनका नाम सामने आया वे थे:

अबी अहमद अली – अपने देश और इरित्रिया के बीच शांति बनाए रखने के लिए इथोपिया के प्रधान मंत्री।

ग्रेटा थुनबर्ग – स्वीडन से किशोर जलवायु योद्धा।

जैसिंडा अर्डर्न – क्राइस्टचर्च पर हुए हमलों के नतीजों पर किए गए उनके प्रयास के लिए न्यूजीलैंड की प्रधान मंत्री।

रावनी मेटुकटायर – अमेज़ॅन वर्षावन की रक्षा के अपने आजीवन काम के लिए ब्राजील की स्वदेशी प्रमुख।

इस दौड़ में शामिल अन्य लोग थे, हॉन्ग कॉन्ग के प्रदर्शनकारी और रिपोर्ट्स फ़ॉर बॉर्डर्स संगठन।

आख़िरकार, विजेता अबी अहमद अली बने। 2018 में सत्ता में आने के बाद, वह इरित्रिया के साथ शांति वार्ता को फिर से शुरू करने पर ध्यान दे रहे थे। उनके बीच काफ़ी लंबे समय से युद्ध चल रहा था [यहाँ पढ़िए उसका इतिहास]

शांति समझौता सफ़ल होने का एक महत्वपूर्ण कारण, अबी अहमद का 2002 में एक अंतरराष्ट्रीय सीमा आयोग के शासन पर बिना किसी शर्त के स्वीकृति देना था। अबी अहमद और इरीत्रिया के राष्ट्रपति, इसाइयस अफवर्की दोनों ने पिछले साल दोनों देशों के बीच शांति की घोषणा की और व्यापार और मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा दिया।

अबी अहमद ने देश की आपातकालीन स्थिति को भी बढ़ावा दिया, मीडिया सेंसरशिप को बंद कर दिया, राजनीतिक कैदियों को स्वतंत्रता दी और नागरिक और सामुदायिक जीवन में महिलाओं की रूपरेखा को उभारा।

उन्होंने अफ्रीका में अन्य देशों के बीच शांति लाने में भी मदद की है, उदाहरण के लिए इरित्रिया और जिबूती के बीच और केन्या और सोमालिया के मतभेदों को सुलझाने की कोशिश की।


लेखक: पेरीना लांबा। पेरीना एक फ्रीलांस लेखक, संपादक और रचनात्मक सलाहकार हैं। वे टोटली मुंबई की सह-लेखिका भी हैं।


जाने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को। यह क्या है और यह असम में चिंता क्यों पैदा कर रहा है?

31 अगस्त, 2019, असम में एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में याद किया जाएगा। इस दिन, 19 लाख से अधिक लोगों को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) से बाहर किया गया, जिसके परिणामस्वरूप वे भारत के गैरनागरिक बन गए। लेकिन ये लोग कौन हैं? ऐसा क्यों हुआ? और आगे क्या होगा?

इन सवालों के जवाब के लिए, आइए नागरिकता और असम राज्य के इतिहास पर नज़र डालते हैं।

असम राज्य भारत और बांग्लादेश की सीमा पर है। 1950 में, विभाजन के बाद, प्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम को लाया गया था ताकि हजारों शरणार्थियों को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से असम में प्रवेश करने से रोका जा सके।

1951 में पहली भारतीय जनगणना (देश की जनसंख्या की आधिकारिक गणना) के दौरान, देश में केवल वास्तविक भारतीय नागरिकों को अनुमति देने के लिए नागरिकों का एक राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) बनाया गया था। हालांकि, इसके लिए कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं थे, इसलिए ऐसा करना आसान नहीं था।

1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी के पहले, कई हज़ार शरणार्थी असम में आए। स्थानीय लोग इसको लेकर परेशान थे और उन्हें वापस भेजने के लिए छह साल तक आंदोलन किया। यह विरोध प्रदर्शन 1985 में असम समझौते के साथ समाप्त हुआ, जिसमें कहा गया था कि 25 मार्च 1971 के बाद भारत आने वाले सभी लोग विदेशी थे और उन्हें यहाँ से निकाला जा सकता था। लेकिन वास्तविक नागरिकों की पहचान करना कठिन था क्योंकि लोग लंबे समय से राज्य में रह रहे थे।

एनआरसी को फिर से शुरू करने के लिए प्रयास किए गए थे लेकिन जब भी ऐसा किया गया, तो उन लोगों ने जोरदार विरोध किया जिन्हें लगता था कि वे देश से निकाले जा सकते हैं। अंत में, कुछ साल पहले, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया कि इस मामले को हल किया जाना चाहिए, और एनआरसी के अंतिम समापन के लिए एक समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए।

2018 में एक सूची बनाई गई थी। एक और क्यों?

वह एक मसौदा सूची थी। सरकार द्वारा जारी इस सूची से, 40 लाख से अधिक लोगों को बाहर रखा गया था, जिनमें अधिकारी और सैनिक शामिल थे जो सेना में थे। इससे भारी हंगामा हुआ। सुप्रीम कोर्ट जो कि क़रीब से इस पर नज़र रखे हुए हुए है, ने कहा कि 31 अगस्त, 2019 तक एक अंतिम, सावधानीपूर्वक विचार की गई संशोधित सूची प्रस्तुत की जाए।

अब लगभग 19 लाख लोगों के साथ क्या होगा?

असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल  ने कहा है कि जिन लोगों के नाम सूची में शामिल नहीं हैं वे शांति बनाए रखें और अगले 120 दिनों में विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स) में अपील दायर करने के लिए कानूनी तरीके का उपयोग करें । यदि वे वहां हार जाते हैं, तो वे उच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं, और यदि आवश्यक हो तो उच्चतम न्यायालय में। प्रभावित लोगों के अलावा, विभिन्न राजनीतिक दलों के राजनेता भी इस बात से नाराज़ हैं कि वास्तविक नागरिकों को सूची से बाहर रखा गया।

आप कैसे साबित करते हैं कि आप भारतीय हैं?

उन्हें सही दस्तावेजों के साथ यह साबित करना होगा कि वे या उनके पूर्वज 24 मार्च 1971 को या उससे पहले भारत के नागरिक थे।

यदि वे अंततः अपना केस हार जाते हैं, तो क्या उन्हें निर्वासित किया जाएगा?

उन्हें हिरासत केंद्र में भेजा जा सकता है, या भेजा जाएगा। वे राज्यहीन लोग होंगे, और इस पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है सिवाय इसके कि उनके पास कोई मतदान अधिकार नहीं होंगे। ऐसे सुझाव दिए गए हैं कि उन्हें वर्क परमिट दिए जा सकते हैं, लेकिन इसका भी विरोध किया जा रहा है।

फ़िलहाल, इस सूची से बाहर किए लोगों के लिए बहुत अनिश्चितता और तनाव भरा समय है।


लेखक: पेरीना लांबा, फ़्रीलांस लेखक, संपादक एवं क्रीएटिव कंसल्टेंट हैं। वे टोटली मुंबई की सह-लेखक भी हैं।


ब्राज़ील के अमेज़न जंगल में फ़ैली भीषण आग बनी चिंता का विषय। आइए, इस पर चर्चा करें।

बड़ी ख़बर: ब्राज़ील में इस साल जंगल में आग की हज़ारों घटनाएँ हुई। ब्राज़ील के नेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्पेस रिसर्च (INPE) का कहना है कि इस साल अमेज़न के जंगलों में  आग लगने की 74,000 घटनाएं हुई, जिनमें से 9,500 पिछले कुछ हफ्तों में ही शुरू हुई हैं।

अमेज़न कहाँ है?अमेज़न दुनिया का सबसे बड़ा वर्षावन है। यह महाद्वीपीय अमेरिका (हवाई और अलास्का के बिना) के आकार के बराबर है। इसका आधे से ज़्यादा हिस्सा ब्राज़ील में है और बाकी हिस्सा कोलंबिया, पेरू और अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों में है। अमेज़न में लगभग एक मिलियन लोग (स्थानीय जनजातियों) रहते हैं और पौधों और जानवरों की तीन मिलियन प्रजातियां मौजूद हैं- जिनमें से 75 प्रतिशत सिर्फ़  अमेज़न में पाई जाती  हैं। हर दो दिन में पौधे या जानवरों की एक नई प्रजाति अमेज़न में मिलती है।

यह खबर चिंतित करने वाली क्यों है?हर साल वर्षावन में आग लगती है लेकिन इस वर्ष आग की घटनाओं की संख्या पिछले साल की तुलना में 80 % अधिक है। ये आग  जंगल और उसके निवासियों को नष्ट कर रही है।वर्षावन कार्बन-डाइऑक्साइड के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। सघन वनस्पति (पौधे और पेड़)वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के ज़रिए हवा में ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस तरह, हमारे ग्रह के वायुमंडल में मौजूद ऑक्सीजन में 20% जंगल का योगदान है। यही कारण है कि यह घना, गर्म और गीला जंगल अक्सर “ग्रह के फेफड़े” के रूप में जाना जाता है।वैज्ञानिकों को डर है कि घटते जंगल के चलते किसी दिन अमेज़न जितनी कार्बन डाइऑक्साइड  ले रहा है उससे अधिक छोड़ने लगेगा । पेड़ जलने या कटने पर कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं जो ये खुद में  जमा कर रहे हैं और इसे स्टोर करने की क्षमता खो देते हैं।

आग का कारण क्या है?ब्राज़ील में शुष्क मौसम के दौरान निम्न स्तर की जंगल की आग सामान्य घटना है जो जुलाई से अक्टूबर तक जारी रहती है। गर्म, शुष्क और हवा होने से आग और लपटें आसानी से फैलती हैं। लेकिन इस साल आग की घटनाओं की संख्या और इसका स्तर खतरनाक है।अधिकांश पर्यावरणविद् कह रहे हैं कि इस वर्ष आग की घटनाओं में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी लोगों द्वारा की गई है। किसान और लकड़ी व्यवसाई लकड़ी के लिए भूमि को साफ़ करना चाहते हैं (वनों की कटाई), सोया लगाने या पशु पालन के लिए जगह बनाने के लिए। आईएनपीई बताता है कि इस साल सिर्फ़ गर्मियों में ही ब्राज़ील में इतने जंगल ख़त्म हो गए हैं जितने  पिछले तीन वर्षों में मिलाकर हुए थे । ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो  जब इस पद के लिए चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्होंने अपने अभियान में  देश की अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण का वादा किया था। यह  स्पष्ट था कि अमेज़न के वर्षावन की रक्षा करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल नहीं था । उन्होंने अमेज़न में राजमार्गों और बांधों के निर्माण की परियोजनाओं का समर्थन किया है जिनके लिए जंगल के कुछ हिस्सों को ख़त्म करना ज़रूरी  है। इसके अलावा, उन्होंने वनों की अवैध कटाई के लिए लगने वाले जुर्माने को कम कर दिया है। वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि उनकी सरकार ने किसानों और लकड़ी व्यवसाइयों को वर्षावन का दोहन और जलाने के लिए प्रोत्साहित किया है।  राष्ट्रपति बोल्सोनारो  ने वैश्विक आलोचना की निंदा करते हुए कहा कि यह “क्वीमाडा” या जलाने का समय है, जब किसान आग लगाकर ज़मीन को खाली  करते हैं।

इसे रोकने के लिए लोग क्या कर रहे हैं?अमेज़न वर्षावन एक प्राकृतिक खज़ाना है जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए। पृथ्वी पर विकास और प्रकृति के बीच संघर्ष चल रहा है। अमेज़न वॉच, रेनफ़ॉरेस्ट एक्शन नेटवर्क और रेनफ़ॉरेस्ट एलायंस जैसे संरक्षण समूह स्थानीय लोगों के साथ मिलकर उनके घर, अमेज़न को विनाश से बचाने के लिए कोशिशें कर रहे हैं।

 


भारत सरकार ने जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन के लिए अनुच्छेद 370 को त्याग दिया है। इस पर चर्चा करते हैं।

आज सुबह राज्य सभा में, भारत के गृह मंत्री, अमित शाह ने एक विधेयक पेश किया, जिससे अंग्रेजों के जाने के बाद जम्मू और कश्मीर को भारत के साथ शामिल होने पर को जो विशेष दर्जा दिया गया था उसे वापस ले लिया गया है। सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A को खारिज कर दिया है और जम्मू और कश्मीर राज्य (J & K) को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया है: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख। जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक दलों के नेताओं को घर में नजरबंद कर के रखा गया है, अतिरिक्त सैनिकों को क्षेत्र में स्थानांतरित किया जा रहा है, फोन और इंटरनेट इस्तमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और लोगों से सार्वजनिक रूप से इकट्ठा न होने के लिए कहा गया है। 

 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के बीच क्या अंतर है?  केंद्र शासित प्रदेश को केंद्र नियंत्रित करता है। राज्य में एक राज्य सरकार होती है।

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक कहता है कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में चंडीगढ़ की तरह कोई विधानसभा नहीं होगी। अन्य केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में दिल्ली और पुदुचेरी की तरह एक विधायिका होगी।

अनुछेद 370 क्या है? भारत के विभाजन के दौरान, जम्मू और कश्मीर से, अन्य मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की तरह, पाकिस्तान का हिस्सा बनने की उम्मीद थी।

जम्मू और कश्मीर की रियासत के नेता, महाराजा हरि सिंह स्वतंत्रता चाहते थे इसलिए उन्होंने एक विशेष समझौते पर हस्ताक्षर किए और भारत के साथ एक रिश्ता बनाया। भारत ने बदले में पाकिस्तान से आक्रमण के खिलाफ शासक की मदद करने का वादा किया।

1949 में, भारत के संविधान में अनुछेद 370 नामक एक विशेष प्रावधान जोड़ा गया जिसमें जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया। अनुच्छेद 370 राज्य को अपना संविधान, एक अलग झंडा और विदेशी मामलों, रक्षा और संचार को छोड़कर सभी मामलों में स्वतंत्रता की अनुमति देता है। यह जम्मू और कश्मीर के लोगों को शेष भारत से अलग-अलग अधिकार देता है, जहां सभी के लिए समान कानून लागू होते हैं।

अनुच्छेद 35A क्या है?  यह जम्मू और कश्मीर के निवासियों की रक्षा करता है और उन्हें विशेष अधिकार देता है। यह निवासियों को उन लोगों के रूप में परिभाषित करता है जो 1954 में इस क्षेत्र में रहते थे, या जो लगातार कम से कम 10 वर्षों से वहां रह रहे थे। केवल निवासी ही सरकारी नौकरी पा सकते हैं और जम्मू-कश्मीर में शिक्षा छात्रवृत्ति पा कर सकते हैं, और केवल निवासी ही जमीन खरीद और रख सकते हैं।

इसमें इतनी बड़ी बात क्या है कि जम्मू और कश्मीर को पुनर्गठित किया गया है और इन अनुछेदों को हटा दिया गया है?  अनुछेद 370 और जम्मू और कश्मीर का दर्जा बहुत लंबे अरसे तक चर्चा में रहे हैं।जम्मू और कश्मीर  के लोग इसलिए परेशान हैं क्योंकि यह समझौता ही वह शर्त थी जिसके तहत विभाजन के समय जम्मू और कश्मीर  क्षेत्र पाकिस्तान की बजाय भारत के साथ पक्षधर थे। दूसरे लोग जिस तरह से यह अचानक और संसद में बिना चर्चा कर के किया गया उसे लेकर परेशान हैं। भारत एक लोकतंत्र है, और वे तर्क देते हैं कि ऐसा करने का सही तरीका इस मुद्दे पर पूरी तरह से बहस करना और जम्मू-कश्मीर के नेताओं को इस पर प्रतिक्रिया देना होता। नेताओं को पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया था। इस तरह, सत्तारूढ़ दल ने लोकतंत्र की प्रक्रिया का पालन किए बिना वो निर्णय लिया है जो उन्हें देश के हित में लगा।

वे ऐसा कैसे कर सकते थे? अनुच्छेद 370 में एक प्रावधान है जो कहता है कि है अगर राज्य विधायिका सहमत हो तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 को भंग कर सकता है। जम्मू और कश्मीर 2019 में राष्ट्रपति शासन के अधीन रहे हैं, और उनके चुनाव अभी भी होने हैं। राष्ट्रपति के पास इस पर चर्चा करने और अनुमोदन लेने के लिए कोई विधायिका नहीं था, इसलिए राष्ट्रपति यह निर्णय लेने और ऐसा कर पाने में सक्षम थे। तकनीकी रूप से सरकार ने इसे इस तरह पूरा किया। बहुत चालाकी है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार ने इस पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 को हटाने का प्रस्ताव क्यों दिया ?

उनका मानना ​​है कि अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों के साथ जुड़ने की अनुमति नहीं दी है। जम्मू-कश्मीर राज्य में ज़्यादा आर्थिक विकास नहीं हुआ है और कई सुरक्षा उल्लंघनों और आतंकवादी घटनाओं को देखा गया है, आखिरी पुलवामा का हमला था। राज्य के लिए विशेष नियमों का मतलब है कि राज्य के बाहर के लोग वहाँ निवेश नहीं कर सकते थे और ज़मीन नहीं खरीद सकते थे जिससे व्यवसायों को बढ़ने का मौका नहीं मिल पा रहा था। इसके अलावा आरक्षण की कमी के कारण अल्पसंख्यक समूहों जैसे अनुसूचित जातियों और महिलाओं के साथ भेदभाव किया जा रहा था।

विभाजन के दौरान अस्थायी प्रावधान के रूप में, भारत के पहले प्रधान मंत्री, जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक रूप से अनुच्छेद 370 की शुरुआत की थी। जम्मू-कश्मीर का यह विशेष दर्जा और शेष भारत के साथ इसका संबंध कई वर्षों से बहस का मुद्दा रहा है।

आज के राजनीतिक कदम से लाखों कश्मीरियों का जीवन बदल जाएगा। क्या यह राजनीतिक कदम जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का जवाब होगा? या यह भारत में आधुनिक-राष्ट्रवाद का उदाहरण है? और जानने के लिए यह जगह देखें।


लेखक: बियाश चोकसी और सुनैना मूर्ति

स्रोत: स्क्रॉल.इन, बीबीसी.कॉम, बिजनेस स्टैंडर्ड, द इकोनॉमिक टाइम्स, इंडिया टुडे, दप्रिंट.इन


यूरोपीय कमीशन के नए अध्यक्ष की नियुक्ति। मिलिए उर्सुला वॉन डेर लेयेन से

क्रेडिट: संघीय सरकार

16 जुलाई 2019 को उर्सुला वॉन डेर लेयेन को यूरोपीय आयोग (ईसी) के अध्यक्ष के रूप में चुना गया , जो यूरोपियन संघ (यूरोपियन यूनियन)  की कार्यकारी शाखा है। उन्हें 783 में से 383 वोट मिले और वे मात्र 7 वोटों के अंतर से जीती। वर्तमान अध्यक्ष जीन क्लाउड जुनकर इस साल अक्टूबर के अंत में इस पद से हटेंगे और उसके  बाद लेयेन यह पद संभालेंगी।

यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष होने के नाते जिन मुद्दों पर उन्हें ध्यान देना होगा उनमें से खास हैं – यूरोपीय संघ के भीतर आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय सुधार;  उन्हें विशेष रूप से व्यापार और ब्रेक्ज़िट से संबंधित मुद्दों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अच्छा तालमेल बनाते हुए काम करना होगा।

उनका चुनाव महत्वपूर्ण क्यों है?

वे यूरोपीय आयोग की पहली महिला अध्यक्ष और 50 से अधिक वर्षों में पहली जर्मन अध्यक्ष होंगी।

वे कौन हैं?

उर्सुला वॉन डेर लेयेन जर्मनी की पहली महिला रक्षा मंत्री थीं। उन्होंने 2013 से उस पद को संभाला और हाल ही में वह पद छोड़ा। इससे पहले, वे जर्मनी के श्रम और सामाजिक मामलों की मंत्री (2009 – 2013) के साथ ही परिवार मामलों और युवा की मंत्री (2005 – 2009) थी।

8 अक्टूबर 1958 को जन्मी लेयेन वर्तमान में 60 वर्ष की हैं। वे एक प्रशिक्षित चिकित्सक और 7 बच्चों की माँ है।

यूरोपीय आयोग के बारे में

यूरोपीय आयोग, यूरोपीय संघ की कार्यकारी शाखा है जो यूरोपीय संघ के दैनिक मामले संभालती है। आयुक्तों को परिषद द्वारा यूरोपीय संसद की मंजूरी के साथ नियुक्त किया जाता है।

यूरोपीय आयोग का अध्यक्ष आयोग का प्रभारी होता है जो यूरोपीय संघ में बने नए कानूनों से जुड़े निर्णय लेता है और यह सुनिश्चित करता है कि उनका पालन किया जाए। अध्यक्ष  विदेश में यूरोपीय संघ (ईयू) का प्रतिनिधि भी है। अध्यक्ष 5 वर्षों के लिए चुना जाता है।

ईयू के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें 


लेखक: प्रीतिका सोनी एक माँ हैं। खाली समय में उन्हें लिखना, फ़ोटोग्राफी और क्रोशिया करना पसंद है। वे एनडीटीवी, मुंबई और एससीएमसोफ़िया से जुड़ी रही हैं।