खेल से जुड़ा विवाद: आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

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कैस्टर सेमेन्या। क्रेडिट: विकिमीडिया कॉमंस

कैस्टर सेमेन्या, साउथ अफ्रीका की मिडिल-डिस्टेंस रनर हैं जो अपने खेल में अभी टॉप पर हैं। हाल की उनकी सफ़लता में 3 मई 2019 को दोहा में आयोजित 800 मीटर रेस में जीत शामिल है। उन्होंने रेस तो जीत ली पर एक लड़ाई हार गई जब कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट (सीएएस) ने उनकी एक याचिका रद्द कर दी। उनकी यह याचिका इंटरनेशनल असोसिएशन ऑफ़ एथलिटिक्स फ़ेडरेशन के उस फ़ैसले को लेकर थी जिसके अनुसार महिला रनर्स में टेस्टोस्टेरॉन  की मात्रा निर्धारित की गई है। कोर्ट के अनुसार “महिलाओं के लिए मुक़ाबले को उचित बनाने के लिए यह फ़ैसला अनिवार्य, सही और संतुलित है।”

मुद्दा क्या है? कैस्टर एक महिला एथलीट हैं जिनमें प्राकृतिक रूप से अन्य महिलाओं की तुलना में उच्च टेस्टोस्टेरॉन स्तर है। टेस्टोस्टेरॉन  एक हार्मोन है जो हमारे शरीर के विकास में मदद करता है और महिलाओं की तुलना में पुरुष में इसका स्तर अधिक होता है।  कैस्टर में उच्च टेस्टोस्टेरॉन  स्टेरॉयड या किसी परफॉर्मन्स बढ़ाने वाली ड्रग के कारण नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से है जब टेस्ट के बाद यह बात उजागर हुई तो अन्य एथलीट्स ने यह कहकर विरोध किया कि इससे हर रेस में उन्हें अनुचित लाभ मिलेगा। कैस्टर को लगता है कि उनके साथ गलत किया गया और उन्होंने कहा  “मैं बस दौड़ना चाहती हूँ, जैसी में पैदा हुई हूँ वैसे ही।”

नए नियम के क्या मायने हैं? इस नए नियम के मुताबिक यदि वे मुकाबला करना चाहती हैं तो उन्हें दवाइयां लेकर अपने टेस्टोस्टेरॉन  स्तर को कम करना होगा। हालाँकि कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट ने उनके खिलाफ फ़ैसला दिया है पर सीएएस ने यह भी कहा कि इस नए नियम को लागू करना मुश्किल था और साथ ही उन्होंने मुक़ाबला करने के लिए, लिए जाने वाले हर्मोन ट्रीटमेंट के साइड इफ़ेक्ट के बारे में भी चेताया।

लिंग। क्रेडिट: पिक्साबे

क्या यह नया नियम उचित है? इस आदेश से लोग नाराज़ हैं और इसने कई मुद्दे खड़े कर दिए हैं। सबसे पहला तो वैज्ञानिक मुद्दा। येल यूनिवर्सिटी की रिसर्चर कैटरीना कार्काज़िस ने कहा कि उच्च टेस्टोस्टेरॉन से बेहतर परफॉर्मन्स होने का कोई प्रमाण नहीं है। शरीर में हार्मोन स्तर लगातार बदलता है और एक ही इंसान में अलग-अलग समय यह अलग हो सकता है। और इसे मॉनिटर नहीं किया जा सकता है बिना नियमित गहन जांच के।

यह लिंग से जुड़ा सवाल भी है। बहुत सी महिला खिलाड़ी जिनकी कद-काठी दूसरे से अधिक है, के हार्मोंस की जांच की गई थी यह ‘साबित’ करने के लिए कि वे महिला हैं। कई लोगों ने कहा कि यह मानव अधिकार के ख़िलाफ़ है और वैश्विक ‘लिंग जांच’ ख़त्म कर की जा चुकी है। हालांकि कुछ लोग अब भी इसके समर्थन में हैं जिसके चलते यह विवादित आदेश दिया गया।

कुछ देश इस नए नियम को लागू करने से मना कर रहे हैं। कैनेडियन सेंटर फ़ॉर एथिक्स इन स्पोर्ट्स, कैनेडियन असोसिएशन फ़ॉर द एडवांसमेंट ऑफ़ वीमैन एंड स्पोर्ट्स और एथलीट्स सीएएन ने कहा कि वे इस फ़ैसले का समर्थन नहीं करते हैं। एथलिटिक्स कनाडा ने कहा कि वह कनाडा में यह नियम नहीं लागू करेगा।

सेमेन्या अभी दौड़ जारी रखने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं और उन्होंने कहा कि वे इस पक्षपात के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगी।

चलिए इस पर चर्चा करते हैं: इस फ़ैसले ने जवाब से ज़्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं। मानव शरीर अलग-अलग हैं। मान लीजिए इसका हल है टेस्टोस्टेरॉन कम करने के लिए दवा लेना पर क्या न्याय के नाम पर इसका उपयोग करना सही है? अगर कोई बास्केटबॉल ख़िलाड़ी प्राकृतिक रूप से लम्बा हो तो? क्या आप उसे इस बात के लिए दंड देंगे या दे सकते हैं? और सही मायने में विकसित देशों के खिलाड़ियों को अन्य खिलाड़ियों के मुक़ाबले जो बेहतर कोचिंग, ट्रेनिंग और डाइट आदि मिलता है, उस फ़ायदे का क्या? और यदि कोई व्यक्ति निजी और स्वास्थ्य कारणों से ये दवाएं नहीं लेना चाहे तो क्या उसे यह जबरदस्ती लेना होगी?

हमें आपकी राय जानकर ख़ुशी होगी इसलिए अपनी राय भेजें मेल@करंटकिड्स.इन पर और हमें बताएं कि आप इस विवाद के बारे में क्या सोचते हैं। यह मुद्दा अभी ख़त्म होने वाला नहीं है।


लेखक: पेरीना लांबा, फ़्रीलांस लेखक, संपादक एवं क्रीएटिव कंसल्टेंट हैं। वे टोटली मुंबई की सह-लेखक भी हैं।

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