कोई पहाड़ इतना ऊँचा नहीं!

कोई पहाड़ इतना ऊँचा नहीं!

निर्मल पुरजा, एक ऐसे नेपाली नागरिक जो पहले ब्रिटिश सेना में काम कर चुके हैं ने सिर्फ़ 189 दिनों में दुनिया के सबसे ऊँचे 14 पहाड़ों पर चढ़कर पहाड़ों की चढ़ाई का रिकॉर्ड तोड़ दिया है!

बस कुछ पर्वतारोही, सिर्फ 40! इस उपलब्धि को हासिल कर पाए। पहले थे, रेनॉल्ड मेसनर जिन्होंने 1986 में 8000 मीटर से भी अधिक की चढ़ाई की। 2010 में, एडुर्ने पासबान इस चुनौती को पूरा करने वाली पहली महिला बनीं।

हिमालय की सभी 14 ऊँची चोटियों पर चढ़ने का पिछला रिकॉर्ड दक्षिण कोरिया के किम चांग-हो के नाम था, जिन्होंने सभी 14 पहाड़ों पर चढ़ाई करने में कुल 7 साल, 11 महीने और 14 दिन का समय लिया था।

निर्मल ने सिर्फ़ 6 महीने में चढ़ाई पूरी करके इस रिकॉर्ड को 7 साल से भी अधिक समयसीमा से तोड़ा! इससे ज़्यादा अच्छी बात क्या हो सकती है कि उन्होंने माउंट एवरेस्ट, ल्होत्से और मकालू (जो दुनिया के चौथे और पाँचवे उच्चतम पहाड़ हैं) की चढ़ाई सिर्फ़ दो दिन में की!

निर्मल ने नांगा परबत (8125 मीटर), के2 (8614 मीटर), ब्रॉड पीक (8051 मीटर), गाशरब्रुम 1 (8080 मीटर), गाशरब्रुम 2 (8035 मीटर), अन्नपूर्णा (8091 मीटर), शीशपंगमा (8027 मीटर), चोयु (8188 मीटर), कंचनजंघा (8586 मीटर), मकालू (8485 मीटर), मनास्लु (8163 मीटर), धौलागिरी 1 (8167 मीटर), ल्होत्से (8516 मीटर) और एवरेस्ट (8848 मीटर) की चढ़ाई की है!

इस शानदार उपलब्धि को हासिल करने के लिए निर्मल पुरजा को बधाई!


सिमोन बाइल्स, ब्रिगिड कोसेगी और कोको गौफ़ में क्या समानता है?

सिमोन बाइल्स, ब्रिगिड कोसेगी और कोको गौफ़ में क्या समानता है? अद्भुत महिलाएं और विश्व स्तरीय एथलीट होने के साथ ही, तीनों ने हाल ही में अविश्वसनीय विश्व रिकॉर्ड तोड़े हैं।

सिमोन बाइल्स एक ऐसी जिमनास्ट हैं जिन्होंने सिर्फ़ 22 साल की उम्र में सर्वाधिक कुल 25 विश्व पदक अपने नाम कर लिए हैं!

25 वर्षीय केन्याई मैराथन धावक ब्रिगिड कोसेगी ने 2:14:04 समय में शिकागो मैराथन (42.2 किलो मीटर/ 26 मील) पूरी करके, दौड़ जीती  और पुराने रिकॉर्ड को तोड़ दिया जो पिछले 16 वर्षों से पाउला रेडक्लिफ ने नाम था!

कोको गौफ़ सिर्फ 15 साल की है! वह हाल ही में ऑस्ट्रिया में लिंज़ में जीतकर डब्ल्यूटीए (वर्ल्ड टेनिस एसोसिएशन) चैम्पियनशिप जीतने वाली अब तक की सबसे कम उम्र की महिला बन गईं। उसने इससे पहले सिंगल और डबल दोनों श्रेणियों में जूनियर खिताब जीता है।


लेखक: दिशा मीरचंदनी। दिशा एक पूर्व लॉयर हैं जो अब एक फ़्रीलांस कंटेन्ट राइटर हैं। वे फ़िटनेस प्रेमी हैं और शौकिया एरियलिस्ट हैं जो खुद का फ़ोटो-ब्लॉग लिखती हैं।


दो रिकॉर्ड तोड़ने वाली एथलीट: शैली-एन फ्रेज़र-प्रिस और एलिसन फेलिक्स

एक बार फिर महिलाओं की अपराजेय शक्ति और ताकत का शानदार प्रदर्शन करते हुए, दो अद्भुत एथलीट ने सप्ताह के अंत में दोहा, कतर में आयोजित आईएएएफ़ विश्व चैंपियनशिप में रिकॉर्ड तोड़ दिए।

तो, ये महिलाएं कौन हैं?

32 वर्षीय जमैका की धावक शैली-एन फ्रेज़र-प्रिस  ने रविवार को इतिहास रच दिया। वे विश्व चैंपियनशिप में 100 मीटर फाइनल जीतने वाली पहली माँ, और सबसे अधिक उम्र की महिला बन गई हैं । रविवार को जीतकर उन्होंने  इस स्पर्धा में चौथा विश्व खिताब अपने नाम किया। उन्होंने यह जीत उनके बेटे ज़ायोन के जन्म के दो साल बाद हासिल की और इसका जश्न मनाने के लिए वह भी मैदान में मौजूद था।

शैली-एन  इससे पहले भी इतिहास बना चुकी हैं जब वे 2008 में 100 मीटर में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली कैरेबियाई महिला, 2012 ओलंपिक खेलों में 100 मीटर श्रेणी में 10.70 सेकंड का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड स्थापित करते हुए लगातार दो स्वर्ण पदक जीतने वाली तीसरी महिला और फिर 2016 में कांस्य पदक लेते हुए लगातार तीन ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली महिला बनीं।

अपनी एथलेटिक उपलब्धियों के अलावा, शैली-एन, जिन्हें प्यार से, पॉकेट रॉकेट ’के नाम से जाना जाता है, “पॉकेट रॉकेट” फाउंडेशन नामक एक गैर-लाभकारी संगठन भी चलाती हैं जो छात्र-एथलीट की मदद करता है। अब तक, फाउंडेशन ने विभिन्न खेल विषयों में हाई स्कूल के छात्रों को 31 पूर्ण स्कॉलरशिप प्रदान की हैं।

विश्व चैंपियनशिप में एक दर्जन, 12 स्वर्ण पदक के साथ, ओलंपिक एथलीट एलिसन फेलिक्स ने पृथ्वी के सबसे तेज़ दौड़ने वाले इंसान उसैन बोल्ट के 11 स्वर्ण पदकों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। फेलिक्स ने 12वां स्वर्ण पदक, रविवार को दोहा में 4 × 400 मीटर ईवेंट में जीता। 33 वर्षीय इस अमेरिकी एथलीट ने अपनी बेटी कैमरी को आपातकालीन सी-सेक्शन के ज़रिये जन्म देने के ठीक 10 महीने बाद यह रिकॉर्ड बनाया। एलिसन को गर्भावस्था के दौरान गंभीर, जानलेवा जटिलताओं का सामना करना पड़ा और उनकी बेटी का जन्म नौ माह पूर्ण होने से 8 सप्ताह पहले हो गया!

एलिसन फेलिक्स के 9 ओलंपिक पदक भी जीते हैं, जिनमें से 6 स्वर्ण हैं और हाल ही में वे महिला खिलाड़ियों के एक समूह का हिस्सा थी  जिनके लिए नाइकी के प्रायोजित एथलीटों के लिए निर्धारित अपनी नीतियों को बदल दिया था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जब कोई एथलीट माँ बनती है तो वो आर्थिक रूप से प्रभावित न हो । एथलीटा के साथ स्पॉन्सरशिप समझौते पर हस्ताक्षर करने वाली वे पहली एथलीट भी हैं। यह एक ऐसा ब्रांड है जो खेल के क्षेत्र में महिलाओं और माताओं का समर्थन करता है और उनका उत्थान करता है

इन दोनों सुपरवीमन को ढेरों बधाई, और यही कामना करते हैं कि ये आने वाले सालों में और कई रिकॉर्ड ध्वस्त करें!

 


 

लेखक: दिशा मीरचंदनी। दिशा एक पूर्व लॉयर हैं जो अब एक फ़्रीलांस कंटेन्ट राइटर हैं। वे फ़िटनेस प्रेमी हैं और शौकिया एरियलिस्ट हैं जो खुद का फ़ोटो-ब्लॉग लिखती हैं।

 


रिकॉर्ड तोड़

शैलीएन फ्रेज़रप्रिस  

एलिसन फेलिक्स

 

 


भारत की पीवी सिंधु ने रचा इतिहास, जापान की ओकुहारा को हराकर बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीता गोल्ड मेडल

भारत की 24 वर्षीय बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु ने इतिहास रच दिया है। सिंधु ने स्विट्ज़रलैंड के बासेल में आयोजित बीडब्ल्यूएफ़ बैडमिंटन विश्व चैंपियनशिप में शीर्ष स्थान हासिल किया। सिंधु ने जापान की नोज़ोमी ओकुहारा को महिला एकल वर्ग में 21-7, 21-7 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उन्होंने सिर्फ़ 36 मिनट में यह जीत हासिल कर ली। यह बैडमिंटन विश्व चैंपियनशिप में भारत और सिंधु का पहला स्वर्ण है।

उन्हें इसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी। लगातार दो फ़ाइनल हारने के बाद, सिंधु ने आखिरकार विश्व चैम्पियनशिप टूर्नामेंट में अपना जलवा बिखेरा। इस रविवार, हैदराबाद की इस लड़की के लिए सब कुछ बदल गया। अब तक वे पाँच विश्व चैम्पियनशिप  में महिला एकल पदक जीत चुकी हैं, और अब उनके पास सिल्वर और ब्रोंज़ के साथ ही गोल्ड मेडल भी है।

 

24 साल की उम्र में, सिंधु भारत में 7 वीं सबसे अधिक आय वाली खिलाड़ी हैं। उन्होंने जीता है

  • 1 रजत पदक ओलंपिक में
  • 5 पदक विश्व चैम्पियनशिप में
  • 2 पदक एशियाई खेलों मेंऔर
  • 3 पदक कॉमनवेल्थ गेम्स में

हाइलाइट्स| @पीवीएससिंधु1 बासेल में अपने करियर की पहली विश्व चैंपियनशिप जीतकर इस हफ़्ते का  शानदार अंत किया 🏸

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— बीडब्लूएफ़ (@बीडब्लूएफ़मीडिया) अगस्त 25, 2019


खेल से जुड़ा विवाद: आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

कैस्टर सेमेन्या। क्रेडिट: विकिमीडिया कॉमंस

कैस्टर सेमेन्या, साउथ अफ्रीका की मिडिल-डिस्टेंस रनर हैं जो अपने खेल में अभी टॉप पर हैं। हाल की उनकी सफ़लता में 3 मई 2019 को दोहा में आयोजित 800 मीटर रेस में जीत शामिल है। उन्होंने रेस तो जीत ली पर एक लड़ाई हार गई जब कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट (सीएएस) ने उनकी एक याचिका रद्द कर दी। उनकी यह याचिका इंटरनेशनल असोसिएशन ऑफ़ एथलिटिक्स फ़ेडरेशन के उस फ़ैसले को लेकर थी जिसके अनुसार महिला रनर्स में टेस्टोस्टेरॉन  की मात्रा निर्धारित की गई है। कोर्ट के अनुसार “महिलाओं के लिए मुक़ाबले को उचित बनाने के लिए यह फ़ैसला अनिवार्य, सही और संतुलित है।”

मुद्दा क्या है? कैस्टर एक महिला एथलीट हैं जिनमें प्राकृतिक रूप से अन्य महिलाओं की तुलना में उच्च टेस्टोस्टेरॉन स्तर है। टेस्टोस्टेरॉन  एक हार्मोन है जो हमारे शरीर के विकास में मदद करता है और महिलाओं की तुलना में पुरुष में इसका स्तर अधिक होता है।  कैस्टर में उच्च टेस्टोस्टेरॉन  स्टेरॉयड या किसी परफॉर्मन्स बढ़ाने वाली ड्रग के कारण नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से है जब टेस्ट के बाद यह बात उजागर हुई तो अन्य एथलीट्स ने यह कहकर विरोध किया कि इससे हर रेस में उन्हें अनुचित लाभ मिलेगा। कैस्टर को लगता है कि उनके साथ गलत किया गया और उन्होंने कहा  “मैं बस दौड़ना चाहती हूँ, जैसी में पैदा हुई हूँ वैसे ही।”

नए नियम के क्या मायने हैं? इस नए नियम के मुताबिक यदि वे मुकाबला करना चाहती हैं तो उन्हें दवाइयां लेकर अपने टेस्टोस्टेरॉन  स्तर को कम करना होगा। हालाँकि कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट ने उनके खिलाफ फ़ैसला दिया है पर सीएएस ने यह भी कहा कि इस नए नियम को लागू करना मुश्किल था और साथ ही उन्होंने मुक़ाबला करने के लिए, लिए जाने वाले हर्मोन ट्रीटमेंट के साइड इफ़ेक्ट के बारे में भी चेताया।

लिंग। क्रेडिट: पिक्साबे

क्या यह नया नियम उचित है? इस आदेश से लोग नाराज़ हैं और इसने कई मुद्दे खड़े कर दिए हैं। सबसे पहला तो वैज्ञानिक मुद्दा। येल यूनिवर्सिटी की रिसर्चर कैटरीना कार्काज़िस ने कहा कि उच्च टेस्टोस्टेरॉन से बेहतर परफॉर्मन्स होने का कोई प्रमाण नहीं है। शरीर में हार्मोन स्तर लगातार बदलता है और एक ही इंसान में अलग-अलग समय यह अलग हो सकता है। और इसे मॉनिटर नहीं किया जा सकता है बिना नियमित गहन जांच के।

यह लिंग से जुड़ा सवाल भी है। बहुत सी महिला खिलाड़ी जिनकी कद-काठी दूसरे से अधिक है, के हार्मोंस की जांच की गई थी यह ‘साबित’ करने के लिए कि वे महिला हैं। कई लोगों ने कहा कि यह मानव अधिकार के ख़िलाफ़ है और वैश्विक ‘लिंग जांच’ ख़त्म कर की जा चुकी है। हालांकि कुछ लोग अब भी इसके समर्थन में हैं जिसके चलते यह विवादित आदेश दिया गया।

कुछ देश इस नए नियम को लागू करने से मना कर रहे हैं। कैनेडियन सेंटर फ़ॉर एथिक्स इन स्पोर्ट्स, कैनेडियन असोसिएशन फ़ॉर द एडवांसमेंट ऑफ़ वीमैन एंड स्पोर्ट्स और एथलीट्स सीएएन ने कहा कि वे इस फ़ैसले का समर्थन नहीं करते हैं। एथलिटिक्स कनाडा ने कहा कि वह कनाडा में यह नियम नहीं लागू करेगा।

सेमेन्या अभी दौड़ जारी रखने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं और उन्होंने कहा कि वे इस पक्षपात के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगी।

चलिए इस पर चर्चा करते हैं: इस फ़ैसले ने जवाब से ज़्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं। मानव शरीर अलग-अलग हैं। मान लीजिए इसका हल है टेस्टोस्टेरॉन कम करने के लिए दवा लेना पर क्या न्याय के नाम पर इसका उपयोग करना सही है? अगर कोई बास्केटबॉल ख़िलाड़ी प्राकृतिक रूप से लम्बा हो तो? क्या आप उसे इस बात के लिए दंड देंगे या दे सकते हैं? और सही मायने में विकसित देशों के खिलाड़ियों को अन्य खिलाड़ियों के मुक़ाबले जो बेहतर कोचिंग, ट्रेनिंग और डाइट आदि मिलता है, उस फ़ायदे का क्या? और यदि कोई व्यक्ति निजी और स्वास्थ्य कारणों से ये दवाएं नहीं लेना चाहे तो क्या उसे यह जबरदस्ती लेना होगी?

हमें आपकी राय जानकर ख़ुशी होगी इसलिए अपनी राय भेजें मेल@करंटकिड्स.इन पर और हमें बताएं कि आप इस विवाद के बारे में क्या सोचते हैं। यह मुद्दा अभी ख़त्म होने वाला नहीं है।


लेखक: पेरीना लांबा, फ़्रीलांस लेखक, संपादक एवं क्रीएटिव कंसल्टेंट हैं। वे टोटली मुंबई की सह-लेखक भी हैं।


सौरव घोषाल: भारतीय स्क्वैश खिलाड़ी दुनिया के टॉप 10 में शामिल!

देश के नाम एक ऐसी उपलब्धि करना जो पहले कभी हासिल न हुई है वाकई बड़ी बात है। सौरव घोषाल ने यह ख्याति पाई है। वे भारत के पहले स्क्वैश खिलाड़ी हैं जो पुरुष श्रेणी में दुनिया के टॉप 10 खिलाड़ियों की सूची में शामिल हुए हैं। वे पिछले 16 वर्षों से पेशेवर रूप से स्क्वैश खेल रहे हैं। बत्तीस वर्ष का यह खिलाड़ी वर्तमान में अपने करियर की बेस्ट रैंकिंग पर है। उनकी सफलता, संघर्ष और कड़ी मेहनत की कहानी बयां करती है। घोषाल ने कोलकाता रैकेट क्लब में खेलते हुए कम उम्र में ही अपने करियर की शुरुआत की। स्कूल के बाद आईसीएल स्क्वैश एकेडमी में खेलने के लिए वे चेन्नई शिफ्ट हो गए जहाँ महान भारतीय स्क्वैश खिलाड़ी सायरस पोंचा उनके कोच रहे।

यहाँ तक पहुँचने में मेरी मदद करने वाले सभी लोगों को धन्यवाद। आज जो मुझे हासिल हुआ है वो कई वर्षों की कड़ी मेहनत का नतीजा है। इस यात्रा में मेरी पत्नी, दोस्त, कोच, स्पॉन्सर्स और शुभ चितकों का बड़ा योगदान रहा है! @टाटाकैपिटल  @हैड_स्क्वैश @सल्मिंग  _स्क्वैश पिक.ट्विटर.कॉम।EFu9LWM82r

— सौरव घोषाल (@सौरव घोषाल) अप्रैल 1, 2019

सौरव बहुत जल्द ही प्रसिद्द हो गए और उन्होंने लगातार 3 जूनियर राष्ट्रीय खिताब जीते। वे जूनियर वर्ल्ड नंबर 1 भी बन गए और यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे। बल्कि, घोषाल ऐसी कई उपलब्धियाँ हासिल करने वाले पहले भारतीय बने। पेशेवर खिलाड़ी बनने के बाद, उन्होंने 2006 में दोहा एशियन खेलों में भारत के लिए कांस्य पदक जीता जो कि स्क्वैश में भारत का पहला पदक था।

वे आगे बढ़ते गए और पहले भारतीय के रूप में वर्ल्ड स्क्वैश चैम्पियनशिप 2017 के क्वार्टर फ़ायनल में पहुँचे। 2018 में घोषाल इन्चियोन में आयोजित एशियन खेलों में पुरुष एकल में सिल्वर पदक जीत कर सफ़लता के शीर्ष पर पहुँच गए। पर वे रुके नहीं और आख़िरकार उन्होंने भारत के लिए गोल्ड जीता,जो कि एशियन खेलों में स्क्वैश में देश का पहला था। कुवैत जैसे राष्ट्रों की मौजूदगी के बावजूद इंडिया ने टीम इवेंट में गोल्ड जीता।

टॉप 10 में पहुँचने पर बहुत ख़ुश हूँ 🙂 ये एक बड़ा लक्ष्य था और यह मेरे दादा-दादी और पिता के लिए है जिन्होंने मेरे लिए बहुत बलिदान दिए। उनके बिना मैं आज यहाँ नहीं होता! उम्मीद है और सफलताएँ मिलती रहेंगी… अभी और इतिहास बनाना है🙂 🙂 पिक.ट्विटर.कॉम ।cGpMMKuTnF

— सौरव घोषाल(@सौरव घोषाल) अप्रैल  1, 2019

घोषाल का दुनिया के टॉप 10 में पहुँचना एक बड़ी उपलब्धि है। भारतीय स्क्वैश सर्किट हमेशा ही जोशना चिनप्पा और दीपिका पल्लीकल की जीत देखते आया है। इन दोनों ने करियर की शुरुआत में ही टॉप 10 में अपनी जगह बना ली थी जबकि सौरव का 32 की उम्र में यह कर दिखाना एक मुश्किल चुनौती रही है। शिकागो में आयोजित पीएसए वर्ल्ड चैम्पियनशिप के क्वाटरफ़ायनल में पहुँचने और स्विट्ज़रलैंड में आयोजित ग्रासहोपर्स कप के क्वाटरफ़ायनल में एक बार फिर अपनी जगह पक्की करने के बाद उन्हें यह सफलता हासिल हुई है।


लेखक: यश चावला। वे एनडीटीवी में एंकर रहे हैं, जिन्हें खेल पत्रकार के रूप में 9 वर्षों का अनुभव है।

 


आईपीएल हुआ शुरू! इस बार ये टॉप 5 टीमें हैं देखने लायक

साल का वह समय आ गया है जब दुनिया भर के क्रिकेटर्स अपनी राष्ट्रीय टीम की ज़िम्मेदारी भूलकर क्लब क्रिकेट का मज़ा लेते हैं। इंडियन प्रीमियर लीग का 12वां सीज़न 23 मार्च को शुरू हो चुका और पहला मुकाबला था पिछले साल की विजेता चेन्नई सुपर किंग्स और रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के बीच। एमएस धोनी चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान हैं और विराट कोहली रॉयल चैलेंजर्स के।

जानिए टॉप 5 टीमों के बारे में जिनके मैच आप ज़रूर देखना चाहेंगे:

फ़ोटो ट्विटर पर देखें

दिल्ली कैपिटल्स

✔@दिल्लीकैपिटल्स

गुरू-शिष्य!

क्या@पृथ्वीशॉ इस सीज़न नारंगी कैप के दावेदार होंगे?#दिसइसन्यूडेल्ही #दिल्लीकैपिटल्स

 

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  1. दिल्ली कैपिटल्स

एक नए नाम और लुक के साथ,  दिल्ली कैपिटल्स अपनी किस्मत बदलना चाहेगी। दिल्ली डेयरडेविल्स के रूप में 11 सीज़न खेलने के बाद यह टीम अब दिल्ली कैपिटल्स के नाम से जानी जाएगी। श्रेयस अय्यर इस टीम के कप्तान हैं जिसमें ऋषभ पंत, शिखर धवन और पृथ्वी शॉ जैसे टैलेंटेड बल्लेबाज़ हैं। ट्रेन्ट बोल्ट, कगिसो रबाडा और इशांत शर्मा गेंदबाज़ों का नेतृत्व करेंगे। यह टीम देखने में तो काफ़ी मज़बूत है। कैपिटल्स का सपोर्ट स्टाफ़ भी काफी दमदार है जिसमें विश्व कप विजेता कप्तान  रिकी पोंटिंग और दादा सौरव गांगुली टीम के मेंटर के रूप में शामिल हैं।

रॉयल चैलेंजर्स

✔@आरसीबीट्वीट्स

शानदार कप्तान @आईएमवीकोहली नेट्स पर भी पीछे नहीं रहते  #प्लेबोल्ड

  1. रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर

पिछले 11 सालों से रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर, शुरुआती मुकाबलों में सभी की पसंदीदा रही है। विराट कोहली की कप्तानी में यह टीम बड़े सितारों से भरी है, लेकिन वे एक भी आईपीएल ट्राफी नहीं जीते हैं। कोहली ने कहा कि भाग्य जीतने में मदद नहीं करता है बल्कि कुछ बड़ी गलतियों के कारण उनकी टीम पिछले मैचों में हारी है। टीम में मार्कस स्टोइनिस, मोईन अली और टिम साऊदी जैसे विदेशी सितारे मौजूद हैं। उम्मीद है कि इस बार बैंगलोर बड़ा चैलेंज देने में कामयाब होगी।

फ़ोटो देखें ट्विटर पर

कोलकतानाइटराइडर्स

✔@केकेराइडर्स

 

छः दिन बाकी!

2011
2012
2014
2016
2017
2018 #केकेआरकाउंटडाउन #केकेआरहैतैयार

  1. कोलकता नाइट राइडर्स

नाइट राइडर्स दो बार आईपीएल विजेता रही है और इस टूर्नामेंट के इतिहास में लगातार अच्छा प्रदर्शन करती रही है।  वे प्लेऑफ़ के लिए 6 बार क्वालिफ़ाय हुए हैं और इसलिए यह टीम घातक मानी जाती है। दिनेश कार्तिक के नेतृत्व में यह टीम बेहत मज़बूत लग रही है।  कार्लोस ब्रेथवेट, सुनील नारायण, क्रिस लिन, रॉबिन उथप्पा और नितीश राणा जैसे सितारे इस टीम में शामिल हैं। फैन्स की पसंदीदा केकेआर हमेशा ही आईपीएल की दावेदार मानी जाती है।

मुंबई इंडियंस

✔@एमआईपलटन

देखें: चौके, छक्के, और भी बहुत कुछ!#क्रिकेटमेरीजान  #वनफैमिली

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  1. मुंबई इंडियंस

देश की वित्तीय राजधानी की टीम मुंबई इंडियंस तीन बार आईपीएल जीत चुकी है। रोहित शर्मा की कप्तानी में मुंबई इंडियंस इस टूर्नामेंट की सबसे मज़बूत टीम है। ऑल-राउंडर हार्दिक और क्रुणाल पांड्या और कैरोन पोलार्ड के साथ इस टीम के चौंथी बार ट्राफी जीतने के बहुत चांस है। भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह भी इस टीम में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं जो अभी भी बहुत दमदार खिलाड़ी हैं।

चेन्नई सुपर किंग्स

✔@चेन्नईआईपीएल

विसल परक्कुम पारु! #थालापराक #विसलपोडू #येलोलव 

  1. चेन्नई सुपर किंग्स

तीन बार की विजेता, चेन्नई सुपर किंग्स बेशक यह खिताब जीतने की मुख्य दावेदार है। जितने सीज़न इन्होंने खेले हैं उनमें हर साल प्लेऑफ़ के लिए क्वालिफ़ाय हुई है और लगातार अच्छा प्रदर्शन करते रही है। एमएस धोनी यलो आर्मी का नेतृत्व करते हैं और इनके देश में सर्वाधिक फैन्स हैं। इस टीम में अनुभवी और युवा खिलाड़ियों का मेल है जिसमें ड्वेन ब्रावो, हरभजन सिंह, अंबाती रायुडु और शेन व्हाटसन शामिल हैं। स्पॉट फ़िक्सिंग के आरोप में दो साल इस टूर्नामेंट से निष्कासित रही सीएसके ने पिछले साल शानदार वापसी करते हुए तीसरा आईपीएल खिताब जीता।

एक और मज़ेदार सीज़न शुरू हो चुका है!

लेखक: यश चावला। वे एनडीटीवी में एंकर रहे हैं, जिन्हें खेल पत्रकार के रूप में 9 वर्षों का अनुभव है।


बेक की तरह चढ़ाई करो!

मौरीन बेक का जन्म से ही एक पैर और एक हाथ नहीं था। हालाँकि यदि आप अकेडिया नेशनल पार्क, मेन, अमेरिका के बाहर होती उनकी परवरिश देखते तो आप इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा पाते। उनके माता-पिता ने उन्हें वैसे ही पाला जिस तरह उनके भाई-बहनों को। जब हर कोई नाव चलाने जाता तो वे भी नाव चलाती। बस फ़र्क इतना था कि वह पैडल को अपने नकली हाथ से घुमाती पानी को पीछे करने के लिए।  उनका कहना है कि उनके परिवार की सकारात्मक सोच ने उन्हें हौसला दिया सब कुछ करने की कोशिश करने का। स्कूल में मौरीन, या ‘मो’ स्पोर्ट्स के पीरियड में बैठने की बजाय, नए-नए खेल खोजने की कोशिश करती। उन्हें सिर्फ़ एक बार निःशक्त बच्चों वाले कैम्प में भेजा गया, जो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्हें लोगों से सहानुभूति लेना बिल्कुल पसंद नहीं था। वे दोबारा उसमें नहीं गई।

उन्हें असल में चट्टानों की चढ़ाई करने का जूनून था। उन्होंने गर्ल स्काउट कैम्प में हिस्सा लिया और जल्द ही यह उनकी पसंदीदा गतिविधि बन गई। कॉलेज पूरा करने के बाद, उन्होंने आइस क्लाइम्बिंग शुरू की। उन्होंने अपने नकली हाथ से ट्रांगो आइस टूल जोड़ने का फैसला किया पर वे इस दुविधा में थी कि किसी और ने पहले ऐसा किया है या नहीं। तो उन्होंने एक पर्वतारोहण से जुड़ी वेबसाइट पर इस बारे में सवाल पोस्ट किया और इस पर मिले जवाब से वे अचंभित थी। ट्रांगो के स्थापक, मैल्कम डेली ने कहा कि वे इस टूल को अपने नकली हाथ पर जोड़ सकती हैं, लेकिन अगर कुछ गलत होता है तो वे उनकी कंपनी पर मुकदमा नहीं कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने भी चढ़ाई की है और उनका दायां पैर नहीं है। यह पहला मौका था जब मौरीन दूसरे निःशक्त पर्वतारोहियों से मिली और इससे वे बहुत रोमांचित हुई।

डेली ने फिर उनसे पूछा कि क्या वे ऊरे, कॉलोराडो में होने वाले गिम्प्स ऑन आइस इवेंट में आना चाहेंगी। यह बर्फ़ पर चढ़ाई करने का कार्यक्रम था जो पैराडॉक्स स्पोर्ट्स द्वारा आयोजित किया जा रहा था। इस कंपनी का उद्देश्य है निःशक्तजनों को पर्वतारोहण के लिए प्रेरित करना और इसमें उनकी मदद करना। मौरीन ने इस मौके का पूरा फ़ायदा उठाया और यह उनके लिए ज़िंदगी बदल देने वाला अनुभव था। ‘जिम्प्स ऑन आइस’, में कई निःशक्तजनों ने हिस्सा लिया और उन सभी में यह समानता थी कि वे सभी खिलाड़ी थे। वे इससे बहुत प्रेरित हुई और 2012 में बौल्डर, कॉलोराडो में बस गई और वे पैराडॉक्स से जुड़े पर्वरोहियों में शामिल हो गई। उन्हें यहाँ अच्छा लगता था क्योंकि वहाँ कोई भी अलग नहीं था। सब वहाँ इसलिए थे क्योंकि उन सभी को पहाड़ पर चढ़ना पसंद था।

2013 में, उन्होंने गोप्रो माउंटेन गेम्स में अन्य खिलाड़ियों के साथ मुक़ाबला किया पहली अनुकूलनीय पर्वतारोहण श्रेणी में। वे यहाँ अपनी हार से बहुत दुखी थी और उन्होंने इसी से प्रेरित होकर और कठिन प्रशिक्षण लिया। 2014 में हुई पहली अनुकूलनीय पर्वतारोहण राष्ट्रीय प्रतियोगिता में वे जीती और उन्होंने स्पेन में होने वाली विश्व प्रतियोगिता के लिए क्वालिफाय किया, जहाँ वे इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग पैराक्लाइम्बिंग वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीतने वाली पहली अमेरिकी महिला बनी। 2016 में फ़्रांस में उन्होंने दोबारा यह ख़िताब जीता। 2018 में, वे तीसरे स्थान पर रही, पर इस बार वे हारने से हताश नहीं थी। मो को अहसास हुआ कि वे इसलिए हारी क्योंकि अब इस श्रेणी में ज़्यादा लोग हिस्सा ले रहे हैं और यह उनकी जीत से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।

प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के साथ ही मौरीन के और भी लक्ष्य हैं। वे ज़्यादा से ज़्यादा निःशक्त लोगों को पर्वतारोहण के लिए प्रेरित करना चाहती हैं। वे अब यूएसए क्लाइम्बिंग की पैराक्लाइम्बिंग कमिटी की अध्यक्ष हैं। वे पैराडॉक्स की इंस्ट्रक्टर और एम्बेसडर भी हैं, और पूरे देश में निःशक्त लोगों के लिए पर्वतारोहण पर वर्कशॉप एवं ट्रेनिंग आयोजित करती हैं।

मौरीन को पुरस्कार-प्राप्त डाक्यूमेन्टरी ‘स्टंम्पड्’ में भी दिखाया गया है। इसमें वे कहती हैं, “लोग मुझे देखते हैं और कहते हैं, ‘वाह, तुम एक हाथ से पहाड़ चढ़ रही हो’।’’ वे सोचते हैं, ‘अब मेरे पास कोई बहाना नहीं है’।” वे आगे कहती हैं, “आपके पास बहाना कभी था ही नहीं।”

ये वाकई सोचने वाली बात है।

‘स्टंम्पड्’ की एक झलक।

 

पेरीना लांबा द्वारा लिखे एक नेशनल जियोग्राफ़िक लेख का रूपांतरण। पेरीना एक फ्रीलांस लेखक, संपादक और क्रीएटिव कंसल्टेंट है। वे टोटली मुंबई की सह-लेखक भी हैं।