क्लाइमेट ट्रैकर: क्या देश जलवायु परिवर्तन से जुड़े अपने लक्ष्यों की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

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बुरी खबर: वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ 2) का स्तर 2019 में खतरनाक-मात्रा में बढ़ने का अनुमान है।

यूएन ने चेतावनी दी है कि दुनिया सदी के अंत तक 3.4॰ सेल्सियस तक गर्म होने की दिशा में बढ़ रही है। इस ग्लोबल वार्मिंग के मानव और अन्य प्रजातियों पर विनाशकारी गर्मी, बाढ़, सूखा जैसे घातक परिणाम हो सकते हैं।

 अच्छी खबर यह है कि अध्ययनों से पता चलता है कि एक संगठित प्रयास 12 वर्षों के भीतर कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकता है और वैश्विक तापमान की बढ़त को 2 डिग्री सेल्सियस तक रोक सकता है।

संदर्भ: 2015 में, दुनिया भर के 195 देशों ने पेरिस जलवायु समझौते नामक एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। पेरिस जलवायु समझौते का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में देशों को एकजुट करना है। प्रत्येक देश ने प्रतिज्ञा की है कि वह 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को एक निश्चित मात्रा में कम कर देगा।

जैसा कि जलवायु संकट सामने आ रहे हैं, वैज्ञानिकों और कुछ नेताओं को लगता है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए तय वैश्विक लक्ष्यों और देशों द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बीच अंतर है।

तो देश जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए क्या कर रहे हैं? दो शोध संगठन एक क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर मेंटेन करते हैं यह देखने के लिए कि कौन-कौन से देश अपने निर्धारित लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए तय दिशा में बढ़ रहे हैं। तो इससे बता चलता है कि कौन दुनिया को बचाने के लिए कुछ कर रहा है और कौन नहीं?

नेशनल ज्योग्राफिक पत्रिका ने इस दिशा में अग्रणी और असफल देशों के नाम उजागर किए हैं:

  1. सबसे अच्छा करने वाले: मोरक्को, गाम्बिया, भारत, कोस्टा रिका और यूरोपीय संघ
  1. बमुश्किल कोई कोशिश करने वाले: अमेरिका, रूस, सऊदी अरब, तुर्की और यूक्रेन
  2. कुछ संभावनाएं दिखाने वाले: नॉर्वे, चीन और यूनाइटेड किंगडम

अग्रणी देश सही तरीके से क्या कर रहे हैं?

मोरक्को और गाम्बिया  चेताइए गए 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक रोकने के लिए अपने CO2 उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य पर है। दोनों देश नवीकरणीय ऊर्जा से अपने बिजली उत्पादन को बढ़ा रहे हैं। उदाहरण के लिए, मोरक्को ने दुनिया में सबसे बड़ा केंद्रित सौर खेत बनाया है, जो 3,500 फुटबॉल मैदानों के आकार के बराबर है और मराकेश के आकार के दो शहरों की बिजली आपूर्ती को पूरा करने में सक्षम है । गाम्बिया पश्चिम अफ्रीका में दुनिया के सबसे विशाल फोटोवोल्टिक संयंत्रों (जो सीधे सूर्य के प्रकाश को बिजली में परिवर्तित करता है) में से एक का निर्माण कर रहा है और 10,000 हेक्टेयर जंगलों, सदाबहार वृक्षों  और सवानाओं को पुनर्स्थापित करने के लिए एक बड़ी परियोजना भी शुरू की है।

 

भारत अपने कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को उस स्तर तक कम करने के लक्ष्य पर काम कर रहे है जिससे वैश्विक तापमान 2 डिग्री सेल्सियस के अंदर सीमित रह सके। भारत जीवाश्म ईंधन की तुलना में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में अधिक निवेश कर रहा है। यह अधिक कोयला-ईंधन वाले बिजली संयंत्रों के निर्माण की योजना को हटाकर  अधिक आक्रामक 1.5 डिग्री सेल्सियस के  लक्ष्य को अपना सकता है।

कोस्टा रिका का लक्ष्य 2021 तक 100 प्रतिशत नवीकरणीय बिजली उत्पादन करना है और वह इस उपलब्धि को हासिल करने के बेहद करीब है। इसकी 98 प्रतिशत बिजली मुख्य रूप से जल विद्युत स्रोतों से प्राप्त होती है।

 

चीन को क्या बेहतर करने की ज़रूरत है? चीनी सरकार ने इलेक्ट्रिक कारों के उत्पादन पर सब्सिडी दी है, जिससे सड़क पर पेट्रोलईंधन वाली कारों की संख्या कम हो गई है। चीन दुनिया में सौर प्रौद्योगिकी का सबसे बड़ा निर्माता भी है। लेकिन कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए इसे और अधिक करने की आवश्यकता होगी। चीन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में सबसे आगे बना हुआ है और दुनिया में कोयले का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।

बुरी खबर: संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और सऊदी अरब सबसे असफल हैं। क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर उनके प्रयासों को “गंभीर रूप से अपर्याप्त” बताता है। ट्रम्प प्रशासन जलवायु परिवर्तन को सुधारने में सहयोगी नहीं है। उनकी नीतियां औद्योगिक प्रगति के लिए हैं, जिसकी कीमत कभी-कभी पर्यावरण को चुकानी पड़ती है। इस प्रकार वैज्ञानिक 2019 में अमेरिकी वार्षिक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि का अनुमान लगाते हैं। स्थिति को और बदतर करने की और इशारा करते हुए, ट्रम्प प्रशासन ने 2020 में पेरिस समझौते से बाहर निकलने की अपनी योजना का संकेत दिया है।

रूस कार्बन डाइऑक्साइड का चौथा सबसे बड़ा उत्सर्जक है और एकमात्र बड़ा उत्सर्जक है जिसने अभी तक पेरिस समझौते के समर्थन की पुष्टि नहीं की है। रूस तो रूस है।

सऊदी अरब कार्बन उत्सर्जन को कम करने के अपने प्रयासों में पिछड़ता जा रहा है। वर्तमान अनुमानों से संकेत मिलता है कि 2030 तक उसका कार्बन उत्सर्जन 2015 के स्तर से 80 प्रतिशत अधिक होगा।


 

क्लाइमेट ट्रैकर: क्या देश

जलवायु परिवर्तन से जुड़े अपने लक्ष्यों की  तरफ़ बढ़ रहे हैं?

क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर

गंभीर रूप से अपर्याप्त,  बहुत अधिक अपर्याप्त, अपर्याप्त

2॰ सेल्सियस के अनुकूल, 1.5॰ सेल्सियस पेरिस समझौते के अनुकूल, आदर्श देश

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