चेहरा बड़े काम का: फ़ेस रिकग्निशन तकनीक

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2017 में पेश आईफ़ोन एक्स  में एक नया फ़ीचर जोड़ा गया था, जो जल्द ही बहुत लोकप्रिय हो गया। अब ये फ़ीचर सभी नए फ़ोन में उपलब्ध है। क्या आप बता सकते हैं ये नया फ़ीचर कौन सा है?

हिंट: यह आपके चेहरे की मदद से आपका फ़ोन अनलॉक करता है। बिल्कुल सही!  यह है फ़ेस आईडी या फ़ेशियल रिकग्निशन (एफ़आर) यानि चेहरा पहचानने की तकनीक! यह क्या है? एक ऐसा सॉफ्टवेयर जो इंसान की पहचान करता है उसके चेहरे  को स्कैन करके। यह सॉफ्टवेयर आपके चेहरे की बारीकियाँ कैद करता है और उसे अपने डेटाबेस में स्टोर करता है  और बाद में यह उसका इस्तेमाल आपकी पहचान प्रमाणित करने में करता है।

यह कैसे इस्तेमाल किया जा रहा है?

चिकित्सा में, एफ़आर का टेस्ट किया जा रहा है डिजॉर्ज सिंड्रोम जैसी जेनेटिक बीमारियों का पता लगाने में।  इस दुर्लभ बीमारी के मरीज़ के चेहरे के फ़ीचर्स सामान्य इंसान से थोड़े से अलग होते हैं। ये अंतर देखने से पता नहीं चलते हैं। एक अध्यन के मुताबिक एफ़आर सॉफ्टवेयर एक फ़ोटोग्राफ को स्कैन करके 96 प्रतिशत सूक्ष्मता के साथ बीमारी का पता लगाने में सफ़ल रहा।

सीइंग एआइ (माइक्रोसॉफ्ट) जैसे एप्प भी हैं जो कम दृष्टि वाले लोगों को अपने आसपास की चीज़ें बेहतर रूप से समझने, दस्तावेज़ को पढ़ने में मदद करते हैं, साथ ही लिखा हुआ पढ़कर भी सुनाते हैं।  इसके अलावा ये एप्प पार्टी आदि सामाजिक कार्यक्रमों के दौरान लोगों से बेहतर ढंग से जुड़ने में भी मदद करते हैं।  उदाहरण के तौर पर, यह उन लोगों को पहचान सकता है जिससे कम दृष्टि वाला इंसान बात कर रहा है और यह उनकी भावनाओं का आंकलन करने में भी मदद कर सकता है। जैसे कि कम दृष्टि वाले इंसान से बात करने वाला व्यक्ति जब मुस्कुराता है तो फ़ोन बज़ करता है! है ना कमाल की बात?

एफ़आर की इस क्षमता का उपयोग कुछ जॉब इंटरव्यू के दौरान भावनाओं को समझने में भी किया जा रहा है। 2017 में, यूनिलीवर (डव साबुन बनाने वाली कंपनी) ने कुछ उम्मीदवारों से वीडियो रेज़यूम मांगे। झूठ, तनाव, उत्सुकता, चिड़चिड़ाहट, आत्मविश्वास का स्तर पता लगाने के लिए वीडियो रेज़यूम एफ़आर सॉफ्टवेयर के ज़रिए स्कैन किए गए। चेहरे का छोटे से छोटा भाव और शरीर की हलचल इंसान के बारे में बहुत कुछ कहती है। कई बार इंसान इन्हें नज़रअंदाज़ कर देता है, पर एफ़आर नहीं। कंपनी ने कुछ लोगों को नौकरी पर रखने के लिए इस जानकारी का इस्तेमाल किया।

चुनौतियाँ:  एफ़आर के इस्तेमाल में कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी हैं और लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या इस तकनीक का उपयोग इस तरह की एप्लीकेशंस में करना चाहिए। बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करता है कि सॉफ्टवेयर एल्गोरिथ्म कितने अच्छे से कोड किए जाते हैं, और यह उन लोगों पर भी निर्भर करता है जिन्होंने ये कोड लिखे हैं और सिस्टम्स को प्रशिक्षित किया है।  हम इंसान सॉफ्टवेयर को भी अपनी धारणाएं सिखा देते हैं जिससे इसका परिणाम प्रमाणित होता है।

सॉफ्टवेयर की एक्यूरेसी इसे दी जानकारी की मात्रा पर भी निर्भर करेगी। हर इंसान अलग है और उसके चेहरे की बनावट भी। इसकी एक्यूरेसी बढ़ाने के लिए विभिन्न नस्ल और सस्कृति के लोगों का बड़ी संख्या में डेटा सॉफ्टवेयर में फ़ीड करना होगा।

जॉब इंटरव्यू के मामले में कहा जाए तो, ऎसी कई बातें हैं जो लोग आमने-सामने बैठकर बेहतर समझा सकते हैं बजाए कि वीडियो इंटरव्यू में। उनके भाव उनकी इस दुविधा से भी प्रभावित हो सकते हैं कि उन्हें यह नौकरी दी जाएगी या नहीं।

सैन फ्रांसिस्को ने एफ़आर पर लगाया बैन14 मई 2019 को सैन फ्रांसिस्को के टेक्नोलॉजी हब, सीए ने पुलिस आदि सरकारी विभाग द्वारा एफ़आर के उपयोग पर बैन लगाने हेतु वोट किया। पुलिस द्वारा एफ़आर का उपयोग अपराधियों की तलाश और भीड़ के बीच उनकी पहचान करने के लिए किया जाता है।

यह तो बहुत उपयोगी लगता है, फिर इसमें समस्या क्या है? अश्वेत लोगों और महिलाओं के मामले में एफ़आर लगभग 35 प्रतिशत समय सही तरीके से काम नहीं करता है।  यह दर तो बहुत ज़्यादा है! क्या हो अगर किसी अपराधी की जगह आपको पकड़ लिया जाए?

सवाल: क्या आपको लगता है समय के साथ फ़ेशियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर कुछ एप्लीकेशंस में इंसान की जगह ले सकता है? ये एप्लीकेशंस  कैसी होंगी?

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लेखक: वैजयंती एक लेखक, प्रकृति प्रेमी और शौकिया वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र हैं। वे उम्मीद करती हैं कि अपने लेखन और नज़रिए से दुनिया को एक बेहतर जगह बना सकें।

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